Dhyan Sadhana Geeta

🧘‍♂ध्यान साधना🧘‍♀

श्वास—प्रश्वास को देखने की सही विधि:

अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधी रखें। रीढ़ झुकी हुई न हो। रीढ़ की सीधी स्थिति में शरीर सहज साम्यावस्था में होता है। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण, ग्रेविटेशन उस पर सम प्रभाव डालता है और उसके भार से मुक्त होने में आसानी होती है। गुरुत्वाकर्षण का भार कम से कम हो तो शरीर शून्य होने में बाधा नहीं देता है।

रीढ़ को सीधी रखें पर शरीर पर कोई तनाव या अकड़ाव नहीं। शरीर सहज शिथिल हो, जैसे किसी खूंटी पर कोई वस्त्र टंगा हो, ऐसा ही वह भी रीढ़ पर टंगा हो। शरीर को ढीला छोड़ दें। फिर गहरी और धीमी श्वास लें। श्वास का आना नाभि—केंद्र को ऊपर नीचे आंदोलित करेगा। उस आंदोलन को देखते रहें। उस पर एकाग्रता नहीं करनी है। उसे केवल देखते रहना है। उसका मात्र साक्षी होना है। स्मरण रखें, हम एकाग्रता को नहीं कह रहे हैं। हम केवल होश, वॉचफुलनेस, सजगता के लिए कह रहे हैं।

श्वास भी ऐसे लें, जैसे छोटे बच्चे लेते हैं। उनका वक्षस्थल तो नहीं कंपता, पर पेट कंपता है। यही विधि नैसर्गिक श्वास—प्रश्वास की है। इसके परिणाम में शांति अपने आप सघन होती जाती है। चित्त—अशांति और तनावों के कारण हम श्वास पूरी लेना धीरे— धीरे भूल ही जाते हैं। युवा होते—होते कृत्रिम श्वास—प्रश्वास हमें पकड़ लेता है। यह तो आपने अनुभव किया ही होगा कि आपका मन जितना अशांत होता है, उतनी ही श्वास—प्रक्रिया अपनी सहजता और गतिबद्धता को खो देती है।

श्वास को नैसर्गिक रूप से लें— लयबद्ध और सहज। उसके संगीत से चित्त—अशांति विलीन होने में सहायता मिलती है। तो इस विधि से आप अपने श्वास-प्रश्वास को देखने का अभ्यास करें।

- गीता ज्ञान परिवार

Comments

Popular posts from this blog

Geeta Gyan

Geeta Gyan

Yog Abhyas